Friday, June 14, 2013

मेरा वक्त का सपना बाकि है...

हालत बहुत निराशजनक है , केवल दो आखो की दृष्टि का राह
अनजाने से एक नए सवेरे का स्वागत करने की तैयारी में है
न तडपते न बिगड़ते मन् की मुस्कान जिंदगी की और ले लेता
फिर भी कही पीछे दूर उस सागर की नीलिमा उसे नाराज़ कर
पीड़ा के उसी काले निर्मम ध्वनियों से परेशान कर देता है पर..
क्यों तुम अभी इसी वक्त के सपनों के पीछे जाना चाहती हो?
क्यों तुम अभी इस वक्त के सफेद रंग पर सोना चाहती हो ?
क्यों इस वक्त ही रात के तारों को बुला करती है ?
एक उतर, एक सांस , एक वक्त और एक सपना
मैं इस वक्त में ही जीना चाहती , मुझे जीने दो 

मुझे जीने दो कि मेरा वक्त का सपना बाकि है ...

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